नई दिल्ली । देश में चल कहे आम चुनाव में नेता आमजन की समस्याओं के समाधान की चर्चा करते है पर समाज में एक ऐसा उपेक्षित वर्ग भी है जो मतदान करने के बाद भी नरक सी जिंदगी जीने के लिए मजबूर है। राजनीतिक पार्टियां अपने-अपने तरीके से वोटरों को लुभाने में लगी हुई हैं। अपने जिस्म का सौदा करने वाला ये तबका इस लोकसभा चुनाव से क्या अपेक्षा करता है? देश में देह व्यापार में फंसी महिलाओं की तादाद करीब 50 लाख है। उनमें वोटर भी हैं। नेता वहां वोट मांगने आते हैं। वो वोट करती भी हैं, लेकिन उसके बाद नेता कभी उन्हें पूछने नहीं आते। इस दलदल में फंसी महिलाएं बहुत सारे अधिकारों से वंचित हैं। मजबूर हैं। कहते हैं जब मजबूरियां हद से गुज़र जाएं, तो कुछ इस सूरत में जश्न की शक्ल ले लेती हैं। एक बाग़ी जश्न। क्योंकि मजबूरियों की क़ब्र पर सजी हैं अय्याशियों की ये महफ़िलें। उस माहौल की खनक में छुपे दर्द को समझने के लिये ज़रूरी नहीं है कि आप एक शायर हों या एक फ़िलॉसफ़र। इसे समझने के लिये आपका बस एक इंसान होना ही काफ़ी है।
किसे नहीं मालूम कि उनकी सूरतों ने सजने से पहले अपनी सीरत को कुचला है। उनके जिस्मों ने दमकने से पहले अपनी रूह का दमन किया है। उनके तन ने मचलने से पहले अपने मन को रौंदा है। यक़ीनन उनके घुंघरुओं की खनक खोखली है। लाचारियों की दहलीज़ पर सजे इस बाग़ी जश्न में ख़ुशियां नहीं बल्कि आक्रोश है। क्योंकि उन्हें कोठों पर जानवरों की तरह छोटे-छोटे कमरों में भरकर रखा जाता है। इसी आक्रोश के साथ तंग गलियों के मौजूद इन कोठों तक पहुंचने वाले रास्ते पर पड़ते लड़खड़ाते क़दमों और मचलते जज़्बात के साथ लोग पहुंचते हैं। अपने दिल की धड़कनों में किसी ख़तरे की आहट को महूसस करने के बावजूद ना जाने किस तलाश में बढ़ते जाते हैं। और उन कोठों पर रहने वाली वो महिलाएं किसी चुनाव और किसी नेता से कोई उम्मीद नहीं करती। क्योंकि चुनाव आते हैं चले जाते हैं और ये महिलाएं अपनी परेशानियों के साथ वहीं उन कोठों में कैद होकर रह जाती हैं।